Saturday, 26 October 2013

अच्छा इ बताओ उस दिन रो काहे रही थी?

अचानक से उसका फ्रेंड रिक्वेस्ट आया था उस दिन. हमने  एक्सेप्ट कर लिया. पहले से उसको जानते थे. हमारे स्कूल में पढ़ती थी. जूनियर थी मेरे से. वो पढ़ाई कर कर के आगे निकल गयी थी. हम गाँव में ही रहते थे.

एक दिन शहर गया. दोस्त के कंप्यूटर से फेसबूक देखा. उसका मैसेज आया था. हमको  नही बुझाया अंग्रेजी में का लिखा था। दोस्त ने बताया, पूछ रही है "कभी ऑनलाइन नहीं आते."

मैंने कोई जवाब नही दिया। क्या लिखते, वो अंग्रेजी में लिखी थी हमको खांटी देहाती में जवाब देना होता। एक महीने बाद फिर जब शहर गए  तो उसका मैसेज फिर आया था. अंग्रेजी में का लिखी थी, नही बुझाया .

दोस्त से पूछने में अब शर्म आ रही थी. घर आ गए.  

पता नहीं काहे अंग्रेजी ग्रैमर कि एगो किताब किन लिए. शहर में ट्यूशन पकड़ लिए. उसको पता चला कि हम अंग्रेजी सिख रहे हैं तो उहो बिच बिच में मुझे कुछ बता देती। ट्यूशन जाने लगा तो सप्ताह में एकाध बार चैटिंग हो जाती.

एक दिन पूछी "आप आज उस लड़की का फोटो क्यूँ लाइक किये हैं".

तपाक से हम बोले "अच्छी लगी थी कर दिए". अगले एक महीने उसका कोई मेसेज नही आया. हाँ एक बात जरुर हुई. उसके बाद हम कभी किसी लड़की का फोटो नही लाइक किए।

फिर से एक दिन उसका मेसेज आया. इस बार हम अंग्रेजी में जवाब दिए.

खुश हो गयी वो. बोली आज प्रसाद चढ़ाऊँगी भगवान् को.

यूँ ही बात करते करते हम ग्रेजुएशन में पहुँच गए वो इंजनियरिंग करने चली गयी. बाबूजी ने लैपटॉप खरीद दिया तो अब विडियो चैटिंग करने लगे थे. तीन साल यूँ ही बित गए.

उस रात हम जैसे ही ऑनलाइन हुआ. उसने मेरा नंबर माँगा।  हम दिये वो तुरत फोन की.

"पापा घर पे शादी कि बात कर रहे हैं," वो बोली.

हम कहे, ठीक है कर लो.

रोने लगी वो जोर जोर से. पहली बार कोई लड़की फोन पे इतना रो रही थी.

हम फोन रख दिए. सो गया. सुबह उठ के देखा तो वो मेरे फ्रेंड लिस्ट में नही थी. उसने हमको ब्लॉक कर दिया था.

साइकिल से कॉलेज जाते वक्त पता नही काहे आँखें झर झर बह रही थी. कहे रो रहे थे पता ही नही चल रहा था.
किसी तरह अंग्रेजी अख़बार में नौकरी हो गयी हमारी अगले २ महीने में.

ऑफिस में अचानक से एक दिन फोन बज उठा. उठाया तो वही थी उस तरफ. सीधे आई लभ यू बोल दी. सामने बॉस बैठे थे. कुछ बोल नही पा रहा था. वो बोले जा रही थी. हम फोन रख दिए। शाम को उसकी माँ का फोन आया.

इस घटना को दो साल हो गए. इस कारवां चौथ की शाम छत पे बैठ के अपने पडोसी को अपनी कहानी सुना रहा था. चाँद उगने ही वाला था.

थाली ले के वो ऊपर आ गयी. "अच्छा इ बताओ उस दिन रो काहे रही थी?" हम पूछ दिए.

"अरे इ सब रात को बताउंगी बेड पे. अभी भूख लग रही है. जल्दी से सामने आ जाइये। व्रत तोड़ लूँ. "


जे सुशिल Jey sushil facebook profile  द्वारा लिखित एक कहानी से प्रेरित।