Saturday, 19 April 2014

तुम्हारे लूज टी-शर्ट




हमारा स्कुल को-एड था. लेकिन लड़कों-लड़कियों के बीच एक अनकही 'लोहे की दीवार' थी. देश के जिस हिस्से से मैं आता हूँ वहाँ ये आम बात है. 

स्कुल में हम लड़कियों से बात भले ही नही करते थे लेकिन 'नयनसुख' प्राप्त करने पे कोई रोक न तो हो सकती थी और न ही थी. लड़कियों के बारे में हमें जो भी पता था वो या तो उन्हें देखने/घूरने से पता था या फिर हमारे इमेजिनेशन का कमाल था.     

पुरे पाँच साल साथ पढ़ने के बाद मैं उसके बारे में बस इतना जान पाया था कि वो थोड़ी मोटी थी और थोड़ी फुर्तीली. वो मेरे स्कुल में साथ ही पढ़ती थी. कभी-कभी वो लडकों वाली भी पतलून पहने दिख जाती. 

और ये भी कि वो मस्त' कैटेगरी वाली लड़की थी. बॉयज हॉस्टल में लड़कों ने लड़कियों की बहुत सारी कैटेगरी बना के रखी थी. 

स्कुल छोड़ देने के बाद मैं उसे भूल गया था. 

एक दिन अनजाने से नम्बर से फ़ोन आया. उठाया तो पता चला ये तो वही थोड़ी मोटी, थोड़ी फुर्तीली और 'मस्त' कैटेगरी वाली लड़की थी. 

बातें हुईं तो पता चला की उसका एक बड़ा परिवार है. बड़ी बहन की अभी शादी करनी थी, बाबूजी बहुत दारु पीते थे और माँ - बस एक गृहिणी थी. भाई अभी नौकरी की तलाश में ही था.

घर में पैसे कि किल्लत थी. भैया की जो पतलून छोटी हो जाती थी माँ थोडा काट-छाँट के उसे लड़कियों के पहनने लायक बना कर उसे दे देती. और वो इतने गर्व से उन पतलूनों को पहनती.   

अपने बाल छोटे रखती थी. ताकि शैम्पू वगैरह का खर्च बच जाता. 

उसके छोटे बाल और केयरलेस तरीके से पहने गए पतलून की वजह से हमें ये लगता था वो बहुत ही एडवांस घर कि लड़की थी. आज पता चला हम लड़के कितने गलत थे. 

खैर बातें होती रहीं. एक दिन मैंने उसको फ़ोन किया. दूसरी तरफ से एक मर्द-आवाज आयी. मैने कहा, मुझे उससे बात करनी है. 

और वो आखिरी कॉल साबित हुआ. उसके बाद से न तो उसका कोई फ़ोन आया न ही वो नंबर कभी फिर ऑन हुआ. मुझे बुरा लगा. लेकिन कोई चारा नही था मेरे पास. 

उसके साथ बिताये एक महीने को मैंने एक खुबशुरत महीना समझ के भूल जाना चाहा. आगे पढाई करते-करते मैं कॉलेज पहुँच गया. मैं फेसबुक पे बहुत एक्टिव रहता हूँ. 

कॉलेज के कुछ फ्रेंड्स को इंटरनेशनल साइंस कांग्रेस में वॉलंटियर बन के दूसरे कॉलेज में जाना था. मेरी एक फ्रेंड भी जाने वाली थी. 

कॉलेज कि तरफ से जो टी-शर्ट उसे मिली थी उसने खो दी थी. उसने मेरा कॉलेज टी-शर्ट माँगा और मैंने दे दिया. वो चली गयी साइंस कांग्रेस में. 

अगले दिन मैं क्लास में बैठा था. तभी मुझे ऑफिस में मुझे बुलाया गया. ये कह के कि मुझसे कोई मिलने आयी है. 

"इस अनजान शहर में जहाँ कॉलेज के लोगों के अलावे मुझे कोई नही जनता, मुझेसे मिलने कौन आ सकती है," मैं ये सोचते-सोचते एडमिन ब्लॉक की सीढियाँ चढ़ने लगा. 

तभी किसी ने पीछे से मेरे टी-शर्ट को पकड़ के खींचा. मैं रुका, पीछे देखा तो अवाक् रह गया.       

"फोन पे बात नहीं करती तो क्या आप अपना पहना हुआ टी-शर्ट लड़की को पहनने के लिए दे देंगे," अब टी-शर्ट छोड़ के उसने मेरे कान पकड़ लिए थे. 

                इन्हीं टी-शर्ट की बात मैं कर रहा हूँ.      फोटो: अंकित फेसबुक   
"अरे क्या हुआ? अचानक से तुम यहाँ कैसे? और तुम्हें कैसे पता मैंने अपना टी-शर्ट किसी लड़की को दिया है," मैं तो एकदम अजीब सा महसूस कर रहा था. 3 सालों बाद वो एकदम से ऐसे कैसे मेरे सामने आ सकती है.  

सामने से लोग आ-जा रहे थे और वो मेरा कान पकडे खड़ी थी. 

"फेसबूक से मुझे पता चला आप कहाँ पढाई कर रहे हैं. मेरे कॉलेज में ही साइंस कांग्रेस हो रहा है. कुछ वॉलंटियर्स को मैंने देखा. वो जो टी-शर्ट पहने हैं उसपे आपके कॉलेज का नाम लिखा है. मैंने उनसे बात की. उसी में से एक ने मुझे बताया आप यही हैं. और ये भी कि वो जो टी-शर्ट पहन रखी थी वो उसकी नही आपकी थी." उसने अब मेरे कान छोड़ दिए थे.   

"मैं आपसे बात नही करती थी, क्योंकि दूसरी जाति के लड़के से बात करना मेरे बाबूजी को पसंद नही. और उनको शायद ये लगता था कि हमारे बीच फ़ोन पे बातें होना तो बस एक शुरआत है. मुझे अजीब सा लगा जब मुझे पता चला एक लड़की आपका पहना हुआ टी-शर्ट पहन रही है. मेरे से बर्दाश्त नही हुआ. मैंने उस लड़की से आपका पता लिया और चली आयी यहाँ."  

"बाप-रे-बाप. आज से मैं खुद का टी-शर्ट पहनूँगा ही नहीं. दूसरे को दे सकने कि बात छोड़ो. मैं तुम्हारे टी-शर्ट से काम चलाऊँगा," मैंने कहा. 

"बुद्धू शरीर नही देखते अपना. डूब जायेंगे मेरे टी-शर्ट में," वो बोली. हंस भी रही थी, सुबक भी रही थी. 

कल शाम हम दोनों बैडमिंटन खेल रहे थे. उसको अपना वेट कम करना था और मुझे उसके टाइम स्पेंड करना था. उसके बाल अब बड़े हो गए थे. जब वो झुक के शटल उठाती और सर्विस करने के लिए खड़ी होती उसके बाल लहराते. मेरा मकसद तो उसके बालों को लहराते देखना था.   

पड़ोस वाले शर्मा अंकल जॉगिंग करते पास से जा रहे थे. "अरे आज तुम्हारा टी-शर्ट इतना लूज क्यों हो रहा है?"  

"गुड इवनिंग अंकल। कैसे हैं आप?" मैं इतना कहा और ऐसे एक्टिंग करने लगा जैसे मैं बैडमिंटन खेलने में बहुत व्यस्त हूँ और उनके प्रश्न का उत्तर नही दे सकता.   

मैं ये नही बताना चाहता था कि जो टी-शर्ट मैंने पहन रखी थी वो तो उसकी थी, जो सामने वाले कोर्ट में खड़ी थी. और 2 सेट जीत चुकी थी. तीसरे में भी 18-11 से आगे थी.  

अंकल जी भी नॉर्मल स्पीड से जॉगिंग करते हुए आगे निकल गए. 

"शुक्र मनाइये अंकल जी ने टी-शर्ट के पीछे लिखा मेरा नाम और नंबर नही देखा. वरना आपकी तो पोल ही खुल जाती. रोज-रोज मेरा टी-शर्ट पहन के आ जाते हैं," वो बोली. 

"क्या सोचते अंकल जी आपके बारे में," वो अपने हाथों से मुँह छुपा के हंसने लगी.    

"अच्छा जी. मेरे बारे में क्या सोचते? अपना शरीर नही देखती. मोटी हो. तुम्हारे टी-शर्ट मुझे तो लूज होंगे ही न. और उसी दिन तो मैंने कहा था न मै आज के बाद केवल तुम्हारा टी-शर्ट पहनूंगा,"           

"क्या बोला? क्या बोला? मोटी. चलो घर आज रात रोटी नही बेलन मिलेंगे," वो बोली और सर्विस करते करते रुक गयी. 

"रात की बात रात में करना डीअर. अभी सर्विस करो," मैंने कहा.