Wednesday, 9 April 2014

ब्रेक-अप के बाद...

अब जबकि तुम नही हो, कहीं नही हो.

मैं बस ये प्रार्थना करूँगा कि, मैं बीमार न पडूं. क्योंकि उस हालात में मुझे बस तुम्हारी ही याद आती है.

मैं ये प्रयास करूँगा कि मैं किसी मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे या किसी भी भगवान् के पास न जाऊँ - वहाँ जाते बंद आँखों से केवल तुम ही दिखती हो.

मैं वो अपनी पुरानी साईकिल भी बेच दूंगा अब. हाई स्कुल में जिस से मैं पढ़ने जाता था. वो पुराने साइकिल घर के एक कोने केवल इसलिए पड़ी है क्यूंकि कभी-कभी तुम भी उस पे बैठ जाती थी.

और वो कार भी जो हमने एक साथ जा के खरीदा था. मेरी नौकरी के दो साल बाद.

दोस्त पूछ रहा था "ब्रेक अप के बाद मैंने वो किताब तुम्हें लौटा दिया जो तुमने इस वेलेन्टाइन डे मुझे फ्लिपकार्ट से भेजा था?"

"मैं क्या -क्या लौटाऊँ उसे. कितनी सारी किताबें हैं, ये कुर्ता जो मुझमे इतनी जँचती है, वो कॉफी मग जिसपे मेरा फ़ोटो लगा है, वो गोल्डेन रंग वाली घड़ी जो मैं पहनता हूँ. ये सब लौटा दूँ तो मैं तो गरीब ही हो जाउंगा," मैंने उसे बोला.

लेकिन मुझे बस एक चीज समझ नही आती कि मैं उन सपनों का क्या करूँ जो साथ साथ हमने देखे थे.

"मैं शादी के बाद नौकरी छोड़ दूंगी. घर पे रहूँगी सुबह में तुम्हारा टाई, रुमाल और शूज ठीक कर के दूंगी और टीफीन लगा के दूंगी, दोपहर में फोन कर के जबरदस्ती तुम्हें ऑफिस से बुलाऊंगी लंच करने के लिए और शाम में साथ में आइसक्रीम खायेंगे," ये सपने अब जिंदगी भर अब सपने रह जायेंगे.

हाँ एक और चीज है जो तुमने मुझे दिया था, वो राइटोमीटर की गुलाबी रंग वाली कलम. उसका क्या करूँगा?

याद है बालू पे हम दो बड़े-बड़े सर्कल बनाते थे. एक में मैं तुम्हारा नाम लिखता था दूसरे में तुम मेरा नाम लिखती थी. लहरें आती थीं और दोनों सर्कल एक दूसरे में खो जाते थे. और साथ ही साथ हम तुम भी.

मुझे पता है तुम भूल जाओगी वो सब.

लेकिन मैं कैसे भूल सकता हूँ. उन लम्हों को जिन्होंने मुझे जिया है और जिनको मैंने जिया है.

राइटोमीटर और एक डायरी भी दी थी तुमने.

जब कुछ समझ नही आयेगा मैं सोन नदी के किनारे चला जाउंगा जहाँ हम बचपन में खेलने चले जाते थे और जवानी में मिलने.

वहीँ बालू पे बैठ के अपने खेलने, मिलने और बिछड़ने की कहानी लिखूँगा. तुम पढ़ोगी न?

कोई जवाब नही आया इस मेल का. 

शब्दांजलि में कहानी प्रस्तुत करते हुए 

आज पता चला था पांच सालों से जिस रास्ते पे हम चलते आ रहे थे वो रेत का था. बहुत मुश्किल से कदम बढ़ पाये थे. 

लेकिन आश्चर्य की बात ये थी बालू पे भी हमारे क़दमों के निशान नही बन पाए.

हाँ जो घर हमने बनाया था एक ही झटक में ढह गया, रेत का जो था.  

घर ढह गया और मै बेघर हो गया, भटकने लगा. पीछे लौटना चाहता था, उस मोड पे जिस मोड पे हम पहली बार मिले थे. फिर से जिंदगी शुरू करना चाहता था.

लेकिन क़दमों के निशान के अभाव में रास्ता भटक गया. वो तो हाथ छोड़ दी थी, भटकते गया.

जब मै अकेले ही वीराने चलता गया पीछे से किसी ने बोला, “धप्पा”.

मैंने देखा तो जिंदगी थी मेरे पीछे.

मैंने पूछा, अब तक मै तुमको समझ नही पाया. कहाँ थी आज तक?

बोली, "मै तो बस चलती जाती हूँ. ठहरती कहाँ? कभी यहाँ, कभी वहाँ. तुम मुझे खोजते हो जहाँ, मै कभी नही मिलूंगी वहाँ. कूदते-फांदते रहो. खेलते-खेलातो रहो. रोओगे तो मै कभी नही मिलूंगी."

“मै समझा नही कहना क्या चाहती हो तुम?

"मै हँसने में हूँ, हँसाने में हूँ. मै इशक में हूँ, मै प्यार में हूँ. मै भय में नही मै निराशा में नही. मै साहस में हूँ मै आशा में हूँ. मैं जिंदगी हूँ."

अच्छा तो ऐसा क्या करूँ तुम सदा मेरे साथ रहो.

"तुम्हारे साथ मैंने कई पड़ाव पार किये है. तुमको परेशां देखा है. हताश देखा है निराश देखा है. तुमको रोते देखा हैतुमको बिलखते देखा है. और जब भी तुमने वैसा किया है. मै चली गयी हूँ दूर तुमसे. तुम्हे कभी पता नही चला. और आज जब वो चली गयी मै फिर से आयी हूँ तुम्हारे पास. ये सब छोडो. जी लो मुझे."

मैंने जिंदगी से कहा, "अभी मैंने तुम्हें समझना शुरू ही किया और तुम इतने पड़ाव पार कर चुकी हो.”

जिंदगी ने कहा, “लेकिन वो पड़ाव ही थे. मुकाम तक तो साथ साथ ही जायेंगे --मै और तुम.." 
मैंने जिंदगी की बाँहों में अपना बाँह डाला और हम साथ साथ चल पड़े.

ब्रेक अप के बाद, जिंदगी के साथ, जिंदगी की ओरजीने की ओर.